बचपन की मासूम उम्र में टूटा पिता का साया
मनीष सिंह का जन्म देवरिया जिले के भटनी ब्लॉक के सल्लहपुर गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय सुरेंद्र सिंह एक सम्मानित किसान और सामाजिक सोच रखने वाले व्यक्ति थे। लेकिन जब मनीष महज 10 वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। पिता के जाने के बाद घर में आर्थिक तंगी का माहौल था, लेकिन मां माया देवी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी हिम्मत, त्याग और मातृत्व से घर को संभाला और बेटों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी।
मनीष सिंह कहते हैं—“मां ही मेरी सबसे बड़ी शक्ति हैं। जब पिताजी का साया सिर से उठा, तो मां ने पिता और गुरु दोनों की भूमिका निभाई।”
खेती-किसानी और मां की पेंशन ही परिवार की आय का मुख्य स्रोत था। ऐसे माहौल में बड़ा होना आसान नहीं था, लेकिन मनीष के मन में कुछ करने की चाह थी, कुछ ऐसा बनने की जो समाज में बदलाव ला सके।
तीन भाई और एक बहन में सबसे जुझारू निकले मनीष
परिवार में मनीष के अलावा उनके दो भाई ऋषि सिंह और नर्वदेश्वर सिंह, तथा एक बहन रानी सिंह हैं। परिवार का हर सदस्य उनके संघर्ष में साथ खड़ा रहा। भाइयों ने खेत संभाले, बहन ने हमेशा हौसला बढ़ाया। इस पारिवारिक एकता और सहयोग ने मनीष को मुश्किल हालात में भी मजबूत बनाए रखा।
गांव की मिट्टी और संघर्ष ने ही मनीष के भीतर समाजसेवा की भावना जगाई। उन्होंने ठान लिया कि वे गांव के लोगों, किसानों और युवाओं की आवाज बनेंगे।
2005 से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा
वर्ष 2005 मनीष सिंह के जीवन का अहम पड़ाव साबित हुआ। इसी वर्ष उन्होंने राजनीति की राह पर कदम रखा। शुरुआत बहुत छोटी थी—एक टूटी साइकिल, सिर पर झुलसाती धूप और दिल में एक बड़ा सपना। वे साइकिल पर निकलकर गांव-गांव, चौपालों और बाजारों में लोगों से संवाद करते, समस्याएं सुनते और समाजवादी विचारधारा की बात करते।
उनके पास न संसाधन थे, न राजनीतिक विरासत, लेकिन उनके पास ईमानदारी, मेहनत और जनता से जुड़ाव था। धीरे-धीरे लोगों ने उन्हें पहचाना, प्यार दिया और समर्थन किया।
मनीष बताते हैं—“मैंने शुरुआत में कभी यह नहीं सोचा था कि राजनीति में इतना आगे बढ़ूंगा। मेरा उद्देश्य सिर्फ जनता की बात उठाना था, लेकिन लोगों का विश्वास मुझे आगे ले गया।”
खेल के मैदान से मिली जुझारू प्रवृत्ति
राजनीति में आने से पहले मनीष एक उत्कृष्ट क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं। बचपन से ही वे खेलों में सक्रिय रहे। क्रिकेट ने उन्हें टीम भावना, अनुशासन और हार-जीत में संतुलन रखना सिखाया। यही गुण बाद में राजनीति में उनके सबसे बड़े हथियार बने।
वे कहते हैं—“खेल ने मुझे सिखाया कि मैदान चाहे क्रिकेट का हो या राजनीति का, जीत उसी की होती है जो अंत तक डटा रहे।”
खेल के मैदान की यही जुझारू प्रवृत्ति राजनीति में भी दिखती है। विरोधियों की आलोचना हो या कठिन राजनीतिक परिस्थितियां, मनीष कभी पीछे नहीं हटे। वे हमेशा मुस्कान और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते रहे।
लेखन और विचार की दुनिया में सक्रिय
राजनीति के साथ-साथ मनीष सिंह एक गंभीर चिंतक और लेखक भी हैं। उन्हें लिखने, पढ़ने और बोलने का शौक है। समाज और राजनीति के गहराई से अवलोकन के बाद वे अब अपनी पहली किताब “Outsider MP” पर लेखन कार्य कर रहे हैं।
इस पुस्तक में वे भारतीय राजनीति की उन सच्चाइयों को उजागर कर रहे हैं जो आमतौर पर जनता की नजर से छिपी रहती हैं। किताब में एक साधारण कार्यकर्ता के संघर्ष, विचार और अनुभवों की झलक मिलेगी।
मनीष का मानना है—“लेखन राजनीति का आईना है। जब हम लिखते हैं, तो अपनी आत्मा से बात करते हैं।”
उनकी लेखनी समाजवादी विचारधारा और सामाजिक समानता के सिद्धांतों से प्रभावित है।
समाजवादी विचारधारा में गहराई से रचे-बसे
मनीष सिंह की राजनीतिक विचारधारा समाजवादी है। वे डॉ. लोहिया, जयप्रकाश नारायण, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के विचारों से प्रेरणा लेते हैं।
उनका मानना है कि समाजवादी राजनीति सिर्फ सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया है।
मनीष ने हमेशा युवाओं से कहा—“राजनीति में आने से पहले समाज को समझो। राजनीति सेवा का माध्यम है, व्यवसाय नहीं।”
वे मानते हैं कि नई पीढ़ी अगर सही दिशा में राजनीति को अपनाए, तो देश का भविष्य और भी उज्ज्वल हो सकता है।
राजनीतिक गुरु और आदर्श
मनीष सिंह के प्रथम राजनीतिक गुरु पूर्व सांसद मोहन सिंह रहे, जिन्होंने उन्हें राजनीति की वास्तविक परिभाषा समझाई। उन्होंने मनीष को बताया कि एक सच्चा नेता वही होता है जो जनता के सुख-दुख में खड़ा रहे।
वहीं उनके राजनीतिक आदर्श श्री अखिलेश यादव हैं, जिनकी सादगी, नवाचार और जनसंपर्क की नीति ने मनीष को गहराई से प्रभावित किया।
मनीष कहते हैं—“अखिलेश यादव जी ने युवाओं को राजनीति में नया नजरिया दिया है। उनका काम और विचार नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं।”
मनीष अपने संघर्ष की प्रेरणा नेताजी मुलायम सिंह यादव से लेते हैं। वे कहते हैं—“नेताजी का जीवन बताता है कि सच्चा समाजवादी कभी झुकता नहीं, चाहे कितनी भी चुनौतियां क्यों न आएं।”
ग्रामीण राजनीति से राष्ट्रीय मंच तक
देवरिया की गलियों से निकले मनीष सिंह ने अब राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना ली है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता के रूप में वे टीवी डिबेट्स, राजनीतिक सम्मेलनों और युवा सम्मेलनों में पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते हैं।
उनकी साफ-सुथरी भाषा, तर्कों की गहराई और शालीन व्यवहार उन्हें बाकी प्रवक्ताओं से अलग बनाता है।
आज जब राजनीति में व्यक्तिगत हमले आम हो गए हैं, मनीष अपने मुद्दों पर आधारित राजनीति के लिए जाने जाते हैं। वे हमेशा कहते हैं—“राजनीति में संवाद जरूरी है, टकराव नहीं।”
उनकी इसी सोच ने उन्हें एक सुलझे हुए और प्रगतिशील नेता के रूप में पहचान दिलाई है।
युवाओं के लिए एक प्रेरक चेहरा
मनीष सिंह ने युवाओं के लिए हमेशा यह संदेश दिया है कि “संघर्ष से भागो मत, उसे अपनाओ”। वे मानते हैं कि आज का युवा अगर समाज और देश की दिशा तय करना चाहता है, तो उसे राजनीति में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए।
वे खुद कई युवा संगठनों, शैक्षणिक कार्यक्रमों और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से युवाओं से जुड़ते हैं। उनका मानना है कि शिक्षित और जागरूक युवा ही एक मजबूत लोकतंत्र की नींव हैं।
उनकी यह सक्रियता उन्हें केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं, बल्कि एक सोच और विचारधारा के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है।
भविष्य की दृष्टि और संकल्प
मनीष सिंह का लक्ष्य केवल राजनीति में ऊंचा पद पाना नहीं है, बल्कि समाज के निचले तबके तक समानता और न्याय की आवाज पहुंचाना है। वे चाहते हैं कि गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं पहुंचे।
उनकी सोच है—“अगर गांव मजबूत होगा, तो देश मजबूत होगा।”
इसी उद्देश्य से वे लगातार ग्रामीण इलाकों में जनसंवाद, शिक्षा शिविर और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
देवरिया के सल्लहपुर गांव से निकले मनीष सिंह की कहानी एक साधारण ग्रामीण युवक के असाधारण संघर्ष की गाथा है। उन्होंने यह दिखाया है कि विपरीत परिस्थितियां व्यक्ति को कमजोर नहीं करतीं, बल्कि अगर हिम्मत हो तो वही परिस्थितियां सफलता की सीढ़ी बन जाती हैं।
आज मनीष सिंह सिर्फ समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं—जो सिखाते हैं कि “अगर इरादे मजबूत हों, तो टूटी साइकिल से भी मंज़िल पाई जा सकती है।”




