प्राथमिक से आठवीं तक अभिभावकों पर बढ़ा आर्थिक बोझ, निजी स्कूलों की मनमानी पर सवाल
भाटपार रानी, देवरिया | पुनित कुमार पांडेय:
शिक्षा को हर बच्चे का मौलिक अधिकार माना गया है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। भाटपार रानी और बनकटा ब्लॉक क्षेत्र में शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक महंगा कारोबार बनती जा रही है। निजी स्कूलों की मनमानी के चलते अभिभावकों को किताबों और ड्रेस के नाम पर भारी खर्च उठाना पड़ रहा है।
स्थिति यह है कि क्षेत्र में कई ऐसे निजी विद्यालय संचालित हो रहे हैं, जिनके पास न तो मान्यता है और न ही कोई वैध पंजीकरण। इसके बावजूद ये स्कूल धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं और अभिभावकों से मनमानी फीस वसूल रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इन अनियमितताओं के खिलाफ न तो कोई ठोस कार्रवाई हो रही है और न ही कोई आवाज उठ रही है।
अप्रैल माह में नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत के साथ ही लार क्षेत्र के अधिकांश निजी विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया तेज हो गई है। इसी के साथ अभिभावकों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ गया है। स्कूल प्रबंधन द्वारा एनसीईआरटी की पुस्तकों के बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें अनिवार्य की जा रही हैं। इसके साथ ही तय दुकानों से ही ड्रेस खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है, जिससे कमीशनखोरी की आशंका भी जताई जा रही है।
“क्या ऐसे ही पढ़ेगा और बढ़ेगा इंडिया?”
सरकार की ओर से “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, “स्कूल चलो अभियान” और “सबको शिक्षा” जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन जब जमीनी स्तर पर निजी स्कूलों की मनमानी और अधिकारियों की निष्क्रियता सामने आती है, तो ये योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित नजर आती हैं।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) लागू होने के बावजूद अभिभावकों को राहत नहीं मिल पा रही है। किताबों और ड्रेस के बढ़ते दामों ने आम परिवारों की कमर तोड़ दी है। अभिभावकों का कहना है कि यदि यही हाल रहा, तो गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा एक सपना बनकर रह जाएगी।
सरकार नई शिक्षा नीति के जरिए बदलाव के बड़े दावे कर रही है, लेकिन निजी स्कूलों की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र का अभाव साफ दिखाई दे रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक शिक्षा के नाम पर यह ‘लूट का बाजार’ चलता रहेगा और जिम्मेदार अधिकारी यूं ही आंखें मूंदे बैठे रहेंगे।
