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Divyang sun And Mother:बकरियां बेचकर दी 20 हजार की रिश्वत, फिर भी नहीं हुआ नामांतरण,₹50 रोज कमाने वाला दिव्यांग बेटा, 6 साल से न्याय को भटकती आदिवासी विधवा की दर्दनाक कहानी।

मध्यप्रदेश: सरकारी सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार ने एक आदिवासी परिवार की जिंदगी को नर्क बना दिया है। मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले की कुंडम तहसील के टिकरिया गांव में रहने वाली बैगा समुदाय की विधवा महिला बेलबाई बैगा पिछले छह वर्षों से अपने पति की जमीन के नामांतरण के लिए दफ्तर-दफ्तर भटक रही है। बकरियां बेचकर 20 हजार रुपये की रिश्वत देने के बावजूद आज तक उसका काम नहीं हुआ। उसकी कहानी सुनकर किसी की भी आंखें भर आएंगी।



पति की मौत के बाद छिन गया सहारा

बेलबाई बैगा के पति जंगलिया बैगा की वर्ष 2019 में मृत्यु हो गई थी। पति के नाम पर नारायणपुर क्षेत्र में करीब 0.90 हेक्टेयर भूमि दर्ज है, जो शासन द्वारा पट्टे पर आवंटित की गई थी। नियमों के अनुसार पति की मृत्यु के बाद इस जमीन का फौती नामांतरण बेलबाई और उसके दोनों बेटों के नाम होना था, लेकिन यही कानूनी प्रक्रिया उसके लिए अंतहीन संघर्ष बन गई।



नामांतरण के बदले मांगी गई रिश्वत

आरोप है कि कुंडम तहसील में नामांतरण कराने के लिए एक ऑपरेटर ने बेलबाई से 20 हजार रुपये की मांग की। गरीब आदिवासी महिला के पास इतने पैसे नहीं थे। मजबूरी में उसने अपनी जीवनयापन का एकमात्र सहारा रही बकरियां बेच दीं और पटवारी के कहने पर यह रकम ऑपरेटर को सौंप दी, इस उम्मीद में कि अब जमीन उसके नाम हो जाएगी।



पैसे भी गए, काम भी नहीं हुआ

रिश्वत देने के बाद भी न तो जमीन का नामांतरण हुआ और न ही किसी अधिकारी ने उसकी मदद की। आज स्थिति यह है कि बेलबाई अपनी ही जमीन को बटाई पर देने में भी असमर्थ है। जमीन से होने वाली आमदनी बंद होने से उसके परिवार की आर्थिक हालत बद से बदतर हो गई है।



जंगल से लकड़ी बीनकर कट रही जिंदगी

आज बेलबाई अपनी बूढ़ी मां और दो बेटों के साथ जंगल से लकड़ी बीनकर और बकरियां चराकर जैसे-तैसे जीवन गुजार रही है। उसका एक बेटा दिव्यांग है, जो महज 50 रुपये रोज की मजदूरी पर काम करता है। इतने कम पैसों में पूरे परिवार का पेट पालना लगभग नामुमकिन है।



6 साल से तहसील से लेकर जिला मुख्यालय तक भटकन

पति की मौत के बाद से बेलबाई तहसील कार्यालय, राजस्व विभाग और जबलपुर जिला मुख्यालय तक के अनगिनत चक्कर काट चुकी है। हर बार उसे सिर्फ आश्वासन मिला, लेकिन नतीजा शून्य रहा। आखिरकार थक-हारकर उसने नामांतरण के लिए रिश्वत मांगे जाने और काम न करने की शिकायत प्रशासन से की।



शिकायत के बाद हरकत में आया प्रशासन

मामला उजागर होने के बाद कलेक्टर ने जांच के निर्देश दिए। कुंडम एसडीएम का कहना है कि नारायणपुर की 0.90 हेक्टेयर भूमि के संबंध में तहसील कार्यालय में फौती नामांतरण का कोई आवेदन दर्ज नहीं मिला है। हालांकि पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल का गठन किया गया है।



वन विभाग भी जांच में शामिल

यह भूमि जंगलिया बैगा को पट्टे पर आवंटित की गई थी और उस पर वनोपज मौजूद है। इसी कारण जांच दल में तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक के साथ वन विभाग के अधिकारी, फॉरेस्ट रेंजर और बीट प्रभारी को भी शामिल किया गया है। जांच टीम रविवार को मौके पर पहुंचकर पूरे मामले की पड़ताल करेगी।



न्याय मिलेगा या लंबी होगी लड़ाई?

छह साल से न्याय की आस लगाए बैठी बेलबाई बैगा की निगाहें अब इस जांच पर टिकी हैं। सवाल यही है कि क्या उसे उसका हक मिलेगा, या फिर सरकारी सिस्टम की जटिलताएं उसकी लड़ाई को और लंबा करेंगी।

यह मामला सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें गरीब, विधवा और आदिवासी महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए वर्षों तक भटकना पड़ता है।