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Indian wine: जंगल का जामुन, दुनिया का जाम! भारतीय देसी वाइन ने अमेरिका-यूरोप में रचा नया इतिहास

नई दिल्ली: जिस जामुन को कभी सिर्फ देसी फल या आयुर्वेद की दवा माना जाता था, वही आज विदेशी बार और फाइन-डाइनिंग रेस्टोरेंट्स में शान से परोसा जा रहा है। भारत की जामुन से बनी देसी वाइन ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऐसा धमाका किया है कि ‘नॉन-ग्रेप वाइन’ अब भारतीय पहचान का नया ग्लोबल चेहरा बनती जा रही है। देश के भीतर वाइन बाजार जहां अभी सीमित दायरे में सिमटा है, वहीं विदेशों में भारतीय फल-आधारित वाइन को जबरदस्त सराहना मिल रही है।


वाइन निर्यात में रिकॉर्ड छलांग, कमाई दोगुनी से ज्यादा

ट्रेड थिंक टैंक GTRI के ताजा आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में भारत से वाइन का निर्यात 6.7 मिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह उछाल भारतीय फलों से बनी अनोखी वाइन के प्रति विदेशी ग्राहकों के बढ़ते भरोसे का परिणाम है।



पहली बार जामुन वाइन का निर्यात, 800 पेटी अमेरिका रवाना

हाल ही में मुंबई से अमेरिका के लिए रवाना हुई एक खेप ने भारतीय वाइन उद्योग के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया। ‘करी फेवर’ (Curry Favour) ब्रांड की 800 पेटी जामुन वाइन अमेरिका भेजी गई हैं। यह वाइन नासिक की सेवन पीक्स वाइनरी में तैयार की गई है।

खास बात यह है कि यह वाइन अंगूर से नहीं, बल्कि पूरी तरह जामुन से बनाई गई है। जल्द ही यह वाइन न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी के चुनिंदा प्रीमियम रेस्टोरेंट्स में परोसी जाएगी। इसे जामुन से बनी भारतीय वाइन का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय निर्यात माना जा रहा है।


भारी टैक्स-ड्यूटी के बावजूद मुनाफे का सौदा

इस प्रोजेक्ट से जुड़े कंसल्टेंट अजय शॉ बताते हैं कि अमेरिका जैसे देशों में आयात पर भारी टैक्स और ड्यूटी लगती है, जिससे कीमत तय करना आसान नहीं था। इसके बावजूद भारतीय निर्माताओं ने कीमत को प्रतिस्पर्धी रखा। नतीजा यह रहा कि यह डील आयातक और निर्माता—दोनों के लिए फायदे का सौदा साबित हुई। यह साबित करता है कि भारतीय फ्लेवर अब सिर्फ भावनाओं के नहीं, बल्कि बिजनेस के भी मजबूत खिलाड़ी बन रहे हैं।


जामुन के साथ आम और सेब भी दुनिया में छाए

भारतीय वाइन की कहानी सिर्फ जामुन तक सीमित नहीं है।

पुणे स्थित रिदम वाइनरी रत्नागिरी के मशहूर अल्फांसो आम से बनी मैंगो वाइन को ब्रिटेन निर्यात कर रही है।

कश्मीरी सेब से बनी वाइन और क्राफ्ट साइडर भी यूरोपीय बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

कश्मीरी सेबों से तैयार ‘L74 क्राफ्ट साइडर’ ब्रिटेन के कई शहरों में जगह बना चुका है।


विदेशी ग्राहकों को भा रहा ‘इंडियन टेस्ट’

विटिकल्चरिस्ट नीरज अग्रवाल के मुताबिक, विदेशी पर्यटक और ग्राहक हमेशा नए और अलग स्वाद की तलाश में रहते हैं। यही वजह है कि यूएई, नीदरलैंड, चीन और फ्रांस जैसे देशों में ‘मेड-इन-इंडिया’ फल-आधारित वाइन की मांग तेजी से बढ़ी है। अप्रैल से अक्टूबर के बीच हुई बिक्री ने पूरे वित्त वर्ष 2024-25 के अनुमानित आंकड़ों को भी पीछे छोड़ दिया है।


देश में संघर्ष, विदेश में चमक

हालांकि विदेशों में सफलता की कहानी लिखी जा रही है, लेकिन भारत में देसी वाइन को अब भी संघर्ष करना पड़ रहा है। कोरोना काल में ‘रिज़र्वा जामुन’ जैसे घरेलू ब्रांड को अच्छी लोकप्रियता मिली थी, लेकिन वह लंबे समय तक बाजार में टिक नहीं सका। यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल की रिपोर्ट बताती है कि भारत में वाइन बाजार की वृद्धि मुख्य रूप से विदेशी ब्रांड्स के कारण हो रही है।



पूर्वोत्तर की वाइन को अब भी इंतजार

पूर्वोत्तर भारत में भी अनोखी फल-आधारित वाइन तैयार की जा रही है, लेकिन निर्यात की राह आसान नहीं।

अरुणाचल प्रदेश की जीरो वैली में बनने वाली कीवी वाइन ‘नारा आबा’ को चीन और ग्रीस में प्रदर्शित किया गया, लेकिन निरंतर निर्यात संभव नहीं हो सका।

असम के उद्यमी आकाश गोगोई, जो पारंपरिक राइस वाइन ‘साज’ (Xaj) बनाते हैं, बताते हैं कि 2022 में सिंगापुर को सैंपल भेजने के बावजूद कोई ठोस करार नहीं हो पाया। उनका कहना है कि सरकारी सब्सिडी और नीति समर्थन के बिना अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिके रहना बेहद मुश्किल है।



देशी फल, वैश्विक पहचान

जामुन, आम, सेब और कीवी जैसे भारतीय फलों से बनी वाइन की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग यह साफ संकेत देती है कि सही नीति, ब्रांडिंग और सरकारी सहयोग मिले तो भारतीय देसी शराब और वाइन उद्योग वैश्विक मंच पर बड़ी ताकत बन सकता है। जंगल और खेतों से निकले फल अब दुनिया के जाम तक पहुंच रहे हैं—और यही भारत की नई ग्लोबल पहचान बनती जा रही है।